भारत का परमाणु मिशन: 'ऊर्जा आत्मनिर्भरता' से 'विश्व गुरु' बनने का सफर
भारत में परमाणु ऊर्जा का विकास
भारत में परमाणु ऊर्जा का विकास केवल बिजली की जरूरत नहीं, बल्कि वैश्विक दबावों के बीच संप्रभुता बनाए रखने का प्रयास रहा है। 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाए गए। यूरेनियम की वैश्विक कमी और आपूर्ति पर लगी रोक ने भारत को अपने विशाल थोरियम भंडारों की ओर देखने के लिए मजबूर किया। भारत के पास दुनिया का लगभग एक-चौथाई थोरियम भंडार है, जो मुख्य रूप से केरल, ओडिशा और आंध्र प्रदेश की तटीय रेत (मोनोजाइट) में पाया जाता है। थोरियम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह यूरेनियम की तुलना में अधिक सुरक्षित है और इससे कम रेडियोधर्मी कचरा निकलता है। भारत के त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम को समझना न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, बल्कि भारत की ऊर्जा संप्रभुता के लिहाज से भी अनिवार्य है। इस कार्यक्रम की संरचना इस तरह की गई है कि भारत अपने सीमित यूरेनियम का उपयोग करके अंततः अपने विशाल थोरियम भंडार से सदियों तक बिजली बना सके।
यहाँ तीनों चरणों का विस्तृत विवरण दिया गया है:
प्रथम चरण: प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर (PHWR)
यह भारत के परमाणु कार्यक्रम की आधारशिला है। वर्तमान में भारत में सबसे अधिक इसी प्रकार के रिएक्टर कार्यरत हैं।
- ईंधन: इसमें प्राकृतिक यूरेनियम U238 का उपयोग किया जाता है। प्राकृतिक यूरेनियम में विखंडन योग्य तत्व U235 केवल 0.7% होता है।
- मंदक और शीतलक: इसमें भारी जल D2O का उपयोग किया जाता है। भारी जल न्यूट्रॉन की गति को धीमा करता है ताकि विखंडन प्रक्रिया निरंतर बनी रहे।
- मुख्य प्रक्रिया: जब प्राकृतिक यूरेनियम का विखंडन होता है, तो ऊर्जा मुक्त होती है। लेकिन साथ ही, जो यूरेनियम नहीं जल पाता U238, वह न्यूट्रॉन सोखकर प्लूटोनियम-239 (Pu239)में बदल जाता है।
- रणनीतिक महत्व: इस चरण का मुख्य उद्देश्य बिजली पैदा करने के साथ-साथ द्वितीय चरण के लिए प्लूटोनियम का स्टॉक जमा करना है। भारत ने इस तकनीक में पूर्ण स्वदेशी महारत हासिल कर ली है।
द्वितीय चरण: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR)
यह चरण भारत की परमाणु आत्मनिर्भरता का सबसे महत्वपूर्ण और कठिन हिस्सा है। इसे "ब्रीडर" (प्रजनक) इसलिए कहते हैं क्योंकि यह जितना ईंधन खर्च करता है, उससे अधिक पैदा करता है।
- ईंधन: इसमें प्रथम चरण से प्राप्त प्लूटोनियम-239 को ईंधन के रूप में और यूरेनियम-238 को मिश्रण के रूप में उपयोग किया जाता है।
- प्रक्रिया: इसमें न्यूट्रॉन की गति को धीमा करने के लिए किसी मंदक (जैसे भारी पानी) का उपयोग नहीं किया जाता, इसलिए इसे "फास्ट" रिएक्टर कहते हैं। रिएक्टर के कोर के चारों ओर थोरियम-232 की एक चादर (ब्लैंकेट) लगाई जाती है।
- ब्रीडिंग (प्रजनन): तीव्र न्यूट्रॉन जब इस थोरियम की चादर से टकराते हैं, तो थोरियम परिवर्तित होकर यूरेनियम-233 (U233) बन जाता है।
- महत्व: यह चरण दो काम करता है—बिजली उत्पादन और तीसरे चरण के लिए यूरेनियम-233 का निर्माण। कलपक्कम में स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) इसी चरण का हिस्सा है।
तृतीय चरण: थोरियम आधारित रिएक्टर (Thermal Breeder Reactors)
यह भारत के परमाणु कार्यक्रम का अंतिम और सबसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। इस चरण में भारत दुनिया का नेतृत्व करेगा क्योंकि अन्य देशों के पास थोरियम की इतनी प्रचुरता नहीं है।
- ईंधन: इसमें मुख्य ईंधन यूरेनियम-233 होगा, जिसे दूसरे चरण से प्राप्त किया गया है। साथ ही, इसमें प्रचुर मात्रा में थोरियम (Th232) का उपयोग किया जाएगा।
- प्रक्रिया: यूरेनियम-233 के विखंडन से ऊर्जा पैदा होगी। इस प्रक्रिया के दौरान निकलने वाले न्यूट्रॉन रिएक्टर में मौजूद अतिरिक्त थोरियम को फिर से यूरेनियम-233 में बदलते रहेंगे।
- आत्मनिर्भरता: यह एक आत्मनिर्भर चक्र बन जाएगा जहाँ थोरियम निरंतर ईंधन की आपूर्ति करता रहेगा।
- स्वदेशी तकनीक: भारत का उन्नत भारी जल रिएक्टर (AHWR) इसी चरण के लिए डिजाइन किया गया है। यह पूरी तरह स्वदेशी होगा और थोरियम का उपयोग करके सुरक्षित ऊर्जा प्रदान करेगा।
तीनों चरणों का तुलनात्मक सारांश
भारत का यह त्रि-चरणीय मॉडल एक "बंद ईंधन चक्र" है। इसका अर्थ है कि एक चरण का कचरा दूसरे चरण के लिए कीमती ईंधन बन जाता है। जब भारत तीसरे चरण को पूर्ण रूप से लागू कर देगा, तो हमें आने वाली कई सदियों तक यूरेनियम आयात करने की आवश्यकता नहीं होगी, और भारत दुनिया का ऊर्जा केंद्र बन जाएगा।
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