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भारत के प्रमुख पर्वतीय दर्रे
  • 🌍 भारत का भूगोल
  • 2026-03-28
  • Virender Singh
  • 549
  • Comments (0)

भारत के प्रमुख पर्वतीय दर्रे

1. प्रस्तावना
भारत की भौगोलिक विविधता इसे विश्व के अन्य देशों से अलग और विशिष्ट बनाती है। उत्तर में हिमालय की विशाल पर्वत श्रृंखलाएँ जहाँ देश के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का कार्य करती हैं, वहीं दक्षिण में पश्चिमी और पूर्वी घाट इसके प्रायद्वीपीय स्वरूप को निखारते हैं। इन ऊँची और दुर्गम पर्वत श्रेणियों के मध्य स्थित वे प्राकृतिक मार्ग, जो आवागमन को संभव और सुलभ बनाते हैं, 'पर्वतीय दर्रे' कहलाते हैं।
पर्वतीय दर्रे केवल दो स्थानों को जोड़ने वाले रास्ते मात्र नहीं हैं, बल्कि ये भारत की सामरिक सुरक्षा, आर्थिक व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के मुख्य केंद्र रहे हैं। प्राचीन काल में जहाँ इन्हीं दर्रों से होकर प्रसिद्ध 'रेशम मार्ग' गुजरता था और विदेशी यात्री भारत पहुँचते थे, वहीं आज के आधुनिक युग में ये दर्रे हमारी सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिकों के लिए जीवनरेखा के समान हैं। हिमालय जैसे कठिन इलाकों में जहाँ ऊँचे पहाड़ों को लांघना लगभग असंभव है, ये दर्रे प्राकृतिक खिड़कियों की तरह कार्य करते हैं, जिससे सेना, व्यापार और संस्कृति का प्रवाह निरंतर बना रहता है।
 

 


2. दर्रों का क्षेत्रीय वर्गीकरण

भारत के पर्वतीय दर्रों को उनकी भौगोलिक स्थिति और हिमालयी श्रेणियों के आधार पर निम्नलिखित महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:

क. लद्दाख और जम्मू-कश्मीर के दर्रे

यह क्षेत्र भारत के सबसे ऊँचे और सामरिक रूप से अत्यंत संवेदनशील दर्रों का घर है। यहाँ के मार्ग न केवल ऊँचाई पर हैं, बल्कि साल के अधिकांश समय बर्फ से ढके रहते हैं।
  • काराकोरम दर्रा: यह लद्दाख के काराकोरम श्रेणियों में स्थित है और भारत का सबसे ऊँचा दर्रा है। प्राचीन काल में यह व्यापारिक मार्ग का हिस्सा था, लेकिन वर्तमान में यह सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादित सीमाओं के निकट है।
  • जोज़िला दर्रा: यह श्रीनगर को लेह (लद्दाख) से जोड़ता है। इसे 'श्रीनगर-लेह का प्रवेश द्वार' कहा जाता है। अत्यधिक बर्फबारी के कारण यह सर्दियों में बंद हो जाता है, जिससे लद्दाख का संपर्क शेष भारत से कट जाता है। इसीलिए यहाँ जोज़िला सुरंग का निर्माण किया जा रहा है।
  • बनिहाल दर्रा: यह पीर पंजाल श्रेणी में स्थित है और जम्मू को श्रीनगर (कश्मीर घाटी) से जोड़ता है। प्रसिद्ध 'जवाहर सुरंग' इसी दर्रे में बनाई गई है, जो हर मौसम में संपर्क सुनिश्चित करती है।

ख. हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के दर्रे

इस क्षेत्र के दर्रे भारत-तिब्बत सीमा पर स्थित हैं और ऐतिहासिक रूप से व्यापार और धार्मिक यात्राओं के मुख्य केंद्र रहे हैं।
  • शिपकी ला (हिमाचल प्रदेश): यह सतलुज नदी का प्रवेश मार्ग है। सतलुज नदी इसी दर्रे के माध्यम से तिब्बत से भारत में प्रवेश करती है। यह भारत और चीन के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापारिक बिंदु भी है।
  • रोहतांग दर्रा (हिमाचल प्रदेश): यह कुल्लू घाटी को लाहौल और स्पीति घाटी से जोड़ता है। इसी के नीचे 'अटल टनल' बनाई गई है।
  • लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड): यह दर्रा भारत के उत्तराखंड राज्य को तिब्बत से जोड़ता है। यह प्रसिद्ध 'कैलाश मानसरोवर यात्रा' के लिए मुख्य मार्ग प्रदान करता है। हाल के वर्षों में यह सामरिक और सीमा विवादों के कारण भी चर्चा में रहा है।
  • नीति और माना दर्रा (उत्तराखंड): ये दोनों दर्रे उत्तराखंड को तिब्बत से जोड़ते हैं और शीतकाल में बर्फ से ढके रहते हैं।

ग. सिक्किम और पूर्वोत्तर के दर्रे

सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के दर्रे भारत-चीन संबंधों और रक्षा नीति के दृष्टिकोण से अत्यंत अनिवार्य हैं।
  • नाथू ला बनाम जेलेप ला (सिक्किम): * नाथू ला: यह दर्रा भारत और चीन के बीच सीधे व्यापार के लिए प्रसिद्ध है। 1962 के युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था और 2006 में पुन: व्यापार के लिए खोला गया।
    • जेलेप ला: यह चुम्बी घाटी से होकर गुजरता है और भारत को ल्हासा (तिब्बत) से जोड़ता है। नाथू ला की तुलना में यह मार्ग अधिक सुलभ माना जाता है।
  • बोमडिला दर्रा (अरुणाचल प्रदेश): यह अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत (ल्हासा) से जोड़ता है। सामरिक रूप से यह तवांग क्षेत्र की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
  • दिफू दर्रा (अरुणाचल प्रदेश): यह भारत, चीन और म्यांमार की सीमाओं पर स्थित एक 'त्रिसंधि' बिंदु है। यह दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ संपर्क स्थापित करने की दृष्टि से सामरिक महत्व रखता है।

3. दर्रों का बहुआयामी महत्व

परीक्षा के दृष्टिकोण से यह खंड अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ आपको भौगोलिक तथ्यों का प्रशासनिक और राजनीतिक महत्व के साथ अंतर्संबंध स्थापित करना होता है।

क. सामरिक महत्व

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा में दर्रे एक महत्वपूर्ण रक्षा कवच की भूमिका निभाते हैं।
  • सीमा सुरक्षा और रसद: भारत-चीन (LAC) और भारत-पाकिस्तान (LoC) जैसी विवादित और संवेदनशील सीमाओं पर सेना की तैनाती पूरी तरह से इन दर्रों पर निर्भर है। भारी हथियारों, बख्तरबंद वाहनों और दैनिक रसद की आपूर्ति इन्हीं मार्गों से होती है।
  • दुर्गम क्षेत्रों तक पहुँच: विश्व के सबसे ऊँचे युद्धक्षेत्र 'सियाचिन' तक पहुँचने के लिए खारदुंग ला जैसे दर्रे भारतीय सेना के लिए "जीवनरेखा" का कार्य करते हैं।
  • रणनीतिक बढ़त: ऊँचे दर्रों पर नियंत्रण होने से पड़ोसी देशों की गतिविधियों पर बेहतर निगरानी रखी जा सकती है। हाल के वर्षों में सीमा सड़क संगठन (BRO) द्वारा दर्रों को जोड़ने वाली सड़कों का तेजी से विकास इसी सामरिक आवश्यकता का हिस्सा है।

ख. आर्थिक महत्व

पर्वतीय दर्रे न केवल सुरक्षा, बल्कि क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की गतिशीलता के लिए भी अनिवार्य हैं।
  • सीमावर्ती व्यापार: ऐतिहासिक रूप से दर्रे व्यापारिक मार्ग रहे हैं। वर्तमान में नाथू ला और शिपकी ला जैसे दर्रे भारत और चीन के बीच सीमित द्विपक्षीय व्यापार के लिए अधिकृत मार्ग प्रदान करते हैं।
  • पर्यटन अर्थव्यवस्था: लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा पर्यटन पर आधारित है। रोहतांग, बारालाचा ला और खारदुंग ला जैसे दर्रे हर साल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के साधन उत्पन्न होते हैं।
  • कनेक्टिविटी और विकास: दर्रों के माध्यम से सुगम परिवहन होने से पहाड़ी उत्पादों (जैसे सेब, केसर, हस्तशिल्प) को मुख्य बाज़ारों तक पहुँचाना आसान होता है।

ग. सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व

भारत की प्राचीन संस्कृति और धार्मिक आस्थाएँ इन दर्रों से गहरे रूप से जुड़ी हुई हैं।
  • तीर्थयात्रा के मार्ग: लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) हिंदू धर्म की सबसे पवित्र यात्राओं में से एक 'कैलाश मानसरोवर यात्रा' के लिए सबसे सुगम और पारंपरिक मार्ग प्रदान करता है। इसी प्रकार, नाथू ला का उपयोग भी कुछ धार्मिक यात्राओं के लिए किया जाता रहा है।
  • सांस्कृतिक आदान-प्रदान: प्राचीन काल में बौद्ध धर्म का प्रसार इन्हीं दर्रों के माध्यम से तिब्बत और मध्य एशिया तक हुआ था। भारतीय संस्कृति, दर्शन और ज्ञान के विदेशों में प्रसार और विदेशी संस्कृतियों के भारत आगमन में इन मार्गों का बहुत बड़ा योगदान है।
  • ऐतिहासिक धरोहर: ये दर्रे प्राचीन 'रेशम मार्ग' के गवाह रहे हैं, जो न केवल व्यापार बल्कि विचारों और संस्कृतियों के मिलन का स्थल था।

4. बुनियादी ढांचा और सुरंगें

पर्वतीय दर्रों की सबसे बड़ी चुनौती उनकी मौसमी संवेदनशीलता है। शीतकाल में भारी बर्फबारी के कारण ये मार्ग महीनों तक बंद रहते हैं, जिससे संपर्क टूट जाता है। इस समस्या के समाधान और 'ऑल वेदर कनेक्टिविटी' सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार ने कई महत्वाकांक्षी सुरंग परियोजनाओं पर कार्य किया है।

क. रोहतांग (अटल टनल)

हिमाचल प्रदेश के पूर्वी पीर पंजाल हिमालयी श्रेणी में स्थित यह टनल आधुनिक इंजीनियरिंग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • लंबाई और ऊँचाई: इसकी कुल लंबाई 9.02 किलोमीटर है। यह समुद्र तल से लगभग 10,000 फीट (3,048 मीटर) की ऊँचाई पर स्थित दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग है।
  • समय की बचत: यह टनल मनाली और लेह के बीच की दूरी को लगभग 46 किलोमीटर कम कर देती है। इससे मनाली और कीलोंग के बीच यात्रा के समय में 4 से 5 घंटे की भारी बचत होती है।
  • महत्व: यह लाहौल और स्पीति घाटी के निवासियों के लिए शीतकाल में भी संपर्क बनाए रखती है और लेह-लद्दाख तक सैन्य रसद पहुँचाने में गति प्रदान करती है।

ख. जोजि़ला टनल परियोजना

लद्दाख क्षेत्र को बारहमासी संपर्क प्रदान करने के लिए यह परियोजना सामरिक दृष्टि से अत्यंत अनिवार्य है।
  • लद्दाख की जीवनरेखा: वर्तमान में जोज़िला दर्रा सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण लगभग 5-6 महीने बंद रहता है, जिससे लद्दाख शेष भारत से कट जाता है।
  • विशेषताएँ: यह एशिया की सबसे लंबी द्वि-दिशात्मक सुरंग होगी, जिसकी लंबाई लगभग 14.15 किलोमीटर है। यह श्रीनगर-कारगिल-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-1) पर स्थित है।
  • प्रभाव: इसके पूर्ण होने के बाद, कश्मीर घाटी और लद्दाख के बीच हर मौसम में सुरक्षित संपर्क बना रहेगा, जो न केवल सेना की रसद आपूर्ति बल्कि स्थानीय व्यापार और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी क्रांतिकारी सिद्ध होगा।

ग. सेला टनल (अरुणाचल प्रदेश)

पूर्वोत्तर भारत में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • तवांग तक पहुँच: यह सुरंग अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग और तवांग जिलों को जोड़ती है। यह 13,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित है।
  • सामरिक महत्व: सेला दर्रा सर्दियों में अक्सर बंद रहता है। यह टनल तवांग क्षेत्र तक भारतीय सेना की 'तीव्र और सुरक्षित' पहुँच सुनिश्चित करती है, जिससे सीमा पर रक्षात्मक तैयारी और अधिक सुदृढ़ होती है।
  • नागरिक लाभ: इससे तवांग में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय लोगों को सालभर परिवहन की सुविधा प्राप्त होगी।

5. चुनौतियाँ और पर्यावरणीय चिंताएँ

परीक्षा में एक संतुलित उत्तर लिखने के लिए केवल महत्व बताना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस विषय से जुड़ी समस्याओं और चुनौतियों का विश्लेषण करना भी अनिवार्य है। पर्वतीय दर्रों के संदर्भ में मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं:

क. भू-आकृतिक अस्थिरता

हिमालय विश्व की सबसे नवीन वलित पर्वत श्रृंखला है, जो अभी भी उत्थान की प्रक्रिया में है।
  • भूस्खलन: दर्रों के आसपास की चट्टानें अक्सर अस्थिर होती हैं। भारी वर्षा या बर्फ पिघलने के कारण यहाँ भूस्खलन की घटनाएँ आम हैं, जिससे सामरिक मार्ग महीनों तक बाधित रहते हैं।
  • भूकंपीय संवेदनशीलता: हिमालयी क्षेत्र उच्च भूकंपीय जोन (Zone IV और V) में आता है। दर्रों और उनके नीचे बनने वाली सुरंगों के लिए यह एक बड़ा ढांचागत खतरा है।

ख. पारिस्थितिकी पर प्रभाव

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना यहाँ की सबसे बड़ी चुनौती है।
  • ग्लेशियर्स का पिघलना: दर्रों के आसपास बढ़ते सड़क निर्माण, भारी वाहनों के आवागमन और कार्बन उत्सर्जन के कारण स्थानीय तापमान में वृद्धि हो रही है। इससे संवेदनशील ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जो भविष्य में जल संकट का कारण बन सकते हैं।
  • पर्यटन का दबाव: रोहतांग और खारदुंग ला जैसे प्रसिद्ध दर्रों पर पर्यटकों की अत्यधिक भीड़ के कारण अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या पैदा हो गई है। प्लास्टिक प्रदूषण और मानवीय हस्तक्षेप से यहाँ का सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो रहा है।

ग. स्थानीय जैव-विविधता का संकट

  • वन्यजीव गलियारों में बाधा: दर्रों के पास बढ़ते बुनियादी ढांचे के निर्माण से हिम तेंदुआ और कस्तूरी मृग जैसे दुर्लभ जीवों के प्राकृतिक आवास और उनके प्रवास मार्गों में व्यवधान उत्पन्न हो रहा है।
  • वनस्पति का क्षरण: ऊँचाई पर पाई जाने वाली दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों का अनियंत्रित दोहन और निर्माण कार्यों के कारण विनाश हो रहा है।

घ. निर्माण और रखरखाव की लागत

  • दुर्गम परिस्थितियाँ: अत्यधिक ऊँचाई, ऑक्सीजन की कमी और हाड़ कंपा देने वाली ठंड के कारण इन क्षेत्रों में सुरंगों या सड़कों का निर्माण करना अत्यंत खर्चीला और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण होता है।
  • अनुरक्षण: सीमा सड़क संगठन (BRO) को हर साल बर्फ हटाने और मरम्मत कार्य पर करोड़ों रुपये व्यय करने पड़ते हैं।

महत्वपूर्ण पर्वतीय दर्रे: एक नज़र में

यह तालिका आपको अंतिम समय में रिविज़न करने में सहायता करेगी:
क्षेत्र/राज्य प्रमुख दर्रा संपर्क मुख्य तथ्य एवं महत्व
लद्दाख खारदुंग ला लेह ↔ नुब्रा घाटी विश्व के सबसे ऊँचे मोटर योग्य मार्गों में से एक; सियाचिन की जीवनरेखा।
लद्दाख जोज़िला श्रीनगर ↔ लेह 'लद्दाख का प्रवेश द्वार'; यहाँ एशिया की सबसे लंबी द्वि-दिशात्मक सुरंग बन रही है।
जम्मू-कश्मीर बनिहाल जम्मू ↔ श्रीनगर पीर पंजाल श्रेणी में स्थित; प्रसिद्ध 'जवाहर सुरंग' यहीं है।
हिमाचल प्रदेश शिपकी ला शिमला ↔ तिब्बत सतलुज नदी इसी दर्रे के माध्यम से भारत में प्रवेश करती है।
हिमाचल प्रदेश रोहतांग मनाली ↔ लाहौल-स्पीति इसके नीचे 'अटल टनल' स्थित है जो बारहमासी संपर्क प्रदान करती है।
उत्तराखंड लिपुलेख उत्तराखंड ↔ तिब्बत कैलाश मानसरोवर यात्रा का मुख्य मार्ग; त्रिसंधि (भारत-चीन-नेपाल) के पास।
सिक्किम नाथू ला सिक्किम ↔ तिब्बत 1962 के युद्ध के बाद 2006 में व्यापार हेतु पुनः खोला गया।
सिक्किम जेलेप ला सिक्किम ↔ ल्हासा चुम्बी घाटी से होकर गुजरता है; प्राचीन व्यापारिक मार्ग।
अरुणाचल प्रदेश बोमडिला अरुणाचल प्रदेश ↔ तिब्बत तवांग के सामरिक महत्व के लिए अनिवार्य मार्ग।
अरुणाचल प्रदेश दिफू भारत ↔ चीन ↔ म्यांमार भारत, चीन और म्यांमार की सीमाओं पर स्थित सामरिक 'त्रिसंधि'।
महाराष्ट्र थाल घाट मुंबई ↔ नासिक उत्तर भारत और मुंबई के बीच प्रमुख रेल और सड़क मार्ग।
महाराष्ट्र भोर घाट मुंबई ↔ पुणे प्रायद्वीपीय भारत का व्यस्ततम मार्ग; दक्षिण भारत को जोड़ता है।
केरल/तमिलनाडु पालघाट पलक्कड़ ↔ कोयंबटूर नीलगिरी और अन्नामलाई पहाड़ियों के बीच स्थित; मानसून का प्रवेश द्वार।

निष्कर्ष

पर्वतीय दर्रे भारत की भौगोलिक अखंडता और सामरिक सुरक्षा के आधार स्तंभ हैं। ये न केवल सीमाओं की रक्षा में सेना की सहायता करते हैं, बल्कि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों के आर्थिक और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बदलते वैश्विक परिदृश्य और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच, इन दर्रों पर 'ऑल वेदर कनेक्टिविटी' विकसित करना और साथ ही हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।
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