द ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट: यह भारत का 'गेम चेंजर' होगा या पर्यावरणीय संकट?
संदर्भ
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप वर्तमान में भारत की सबसे महत्वाकांक्षी और चर्चा का विषय बनी विकास परियोजनाओं में से एक का केंद्र है। लगभग ₹72,000 करोड़ की अनुमानित लागत वाली यह परियोजना न केवल भारत की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत को वैश्विक व्यापार के केंद्र में लाने की एक बड़ी कोशिश भी है। इस ब्लॉग में हम इस प्रोजेक्ट के हर पहलू को गहराई से समझेंगे—इसकी शुरुआत से लेकर अब तक के विवादों, इसके लाभों और इसके कारण पैदा होने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों तक।
क्या है द ग्रेट निकोबार होलिस्टिक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट?
नीति आयोग के मार्गदर्शन में तैयार की गई इस महा-परियोजना का उद्देश्य ग्रेट निकोबार द्वीप के रणनीतिक स्थान का लाभ उठाना है। यह द्वीप हिंद महासागर में स्थित 'मलक्का जलडमरूमध्य' के बहुत करीब है, जहाँ से दुनिया का एक बड़ा व्यापारिक जहाज यातायात गुजरता है।
इस परियोजना के चार मुख्य घटक हैं:
- पहला: गैलाथिया बे इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): इस प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा एक विशाल बंदरगाह है। इसका उद्देश्य भारत को सिंगापुर और कोलंबो के विकल्प के रूप में स्थापित करना है ताकि बड़े मालवाहक जहाज यहाँ रुक सकें।
- दूसरा: ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट: यहाँ एक अत्याधुनिक हवाई अड्डा बनाया जाएगा जो नागरिक उड़ानों के साथ-साथ सैन्य रणनीतिक संचालन के लिए भी उपयोग होगा।
- तीसरा: स्मार्ट टाउनशिप: विकास को गति देने के लिए एक आधुनिक शहर बसाने की योजना है, जिसमें आवासीय और व्यापारिक दोनों क्षेत्र होंगे।
- चौथा: पावर प्लांट: शहर और पोर्ट की बिजली जरूरतों के लिए एक 450-MVA गैस और सौर हाइब्रिड बिजली संयंत्र स्थापित किया जाएगा।
इस प्रोजेक्ट में अब तक क्या हुआ?
- 2021 (प्रस्तावना): नीति आयोग ने इस द्वीप के एकीकृत विकास की योजना प्रस्तुत की। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम (ANIIDCO) को इसका नोडल निकाय बनाया गया।
- 2022 (मंजूरी का दौर): पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने परियोजना के लिए पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) की समीक्षा की। मई 2022 में इसे कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दी गई।
- 2023-2024 (कानूनी और सामाजिक विरोध): नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में कई याचिकाएं दायर की गईं। पर्यावरणविदों और नृवंशविज्ञानियों ने यहाँ की आदिम जनजातियों और दुर्लभ जीवों पर पड़ने वाले प्रभाव के खिलाफ आवाज उठाई।
- वर्तमान स्थिति (2025-26): वर्तमान में, परियोजना प्रारंभिक निर्माण और भूमि सुधार के चरणों में है, लेकिन यह अभी भी सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न पर्यावरण समितियों की कड़ी निगरानी में है।
भारत के लिए इसका महत्व: रणनीतिक और आर्थिक पक्ष
1. सामरिक और रक्षा महत्व
ग्रेट निकोबार 'सिक्स डिग्री चैनल' के पास स्थित है। यहाँ एक सैन्य हवाई अड्डा और मजबूत बंदरगाह होने से भारत 'मलक्का जलडमरूमध्य' पर कड़ी निगरानी रख सकता है। यह विशेष रूप से हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता को संतुलित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
2. समुद्री व्यापार का केंद्र
वर्तमान में, भारत के पूर्वी तट पर आने वाले कई कंटेनरों को कोलंबो या सिंगापुर में ट्रांसशिपमेंट (माल को बड़े जहाज से छोटे जहाज में बदलना) करना पड़ता है। गैलाथिया बे पोर्ट बनने से भारत को सालाना करोड़ों डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत होगी और यह दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रमुख लॉजिस्टिक्स हब बन जाएगा।
3. रोजगार और बुनियादी ढांचा
इस मेगा प्रोजेक्ट से आने वाले दशकों में हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की उम्मीद है। यह अंडमान-निकोबार की स्थानीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बदल सकता है।
पर्यावरणीय चुनौतियाँ और चिंताएँ
ग्रेट निकोबार एक 'यूनेस्को बायोस्फीयर रिजर्व' है। विकास की इस दौड़ में यहाँ की प्रकृति को लेकर निम्नलिखित गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं:
- वनों की कटाई: अनुमान है कि इस परियोजना के लिए लगभग 130 वर्ग किलोमीटर उष्णकटिबंधीय वर्षावन काटे जाएंगे। इससे लगभग 8.5 लाख से 9 लाख पेड़ों के प्रभावित होने की आशंका है।
- लेदरबैक कछुए: गैलाथिया बे दुनिया के सबसे बड़े कछुओं—जायंट लेदरबैक कछुओं—का प्रमुख प्रजनन स्थल है। बंदरगाह के निर्माण से उनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो सकता है।
- निकोबार मेगापोड: यह एक दुर्लभ पक्षी है जो केवल इसी क्षेत्र में पाया जाता है। वनों के विनाश से इनके विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है।
- कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें): समुद्र में निर्माण कार्य से कोरल रीफ को भारी नुकसान होगा, जो समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का आधार हैं।
जनजातीय अस्तित्व पर संकट
यह द्वीप मुख्य रूप से दो प्राचीन जनजातियों का घर है: शोंपेन और निकोबारी।
- शोंपेन जनजाति 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' (PVTG) की श्रेणी में आती है। वे बाहरी दुनिया से बहुत कम संपर्क रखते हैं।
- विशेषज्ञों का मानना है कि अचानक बाहरी लोगों के आने और शहरीकरण से उनकी संस्कृति, स्वास्थ्य और अस्तित्व पर संकट आ सकता है।
सरकार का पक्ष और समाधान की दिशा
सरकार और नीति आयोग ने इन चिंताओं के जवाब में कई सुरक्षा उपायों का प्रस्ताव दिया है:
- मुआवजा वनीकरण: काटे गए पेड़ों के बदले में हरियाणा या अन्य राज्यों में उतने ही पेड़ लगाने की योजना है (हालाँकि आलोचक इसे द्वीप के वर्षावनों का विकल्प नहीं मानते)।
- संरक्षण योजनाएं: कछुओं के लिए वैकल्पिक संरक्षण केंद्र और मेगापोड पक्षी के लिए विशेष क्षेत्रों को सुरक्षित रखने का वादा किया गया है।
- ग्रीन पोर्ट मानक: बंदरगाह को शून्य-उत्सर्जन और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा।
निष्कर्ष: विकास और संरक्षण का संतुलन
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' का एक मजबूत स्तंभ है। यह भारत की आर्थिक और सैन्य शक्ति को वैश्विक स्तर पर बढ़ाने की क्षमता रखता है। हालाँकि, यह परियोजना एक "सभ्यतागत विकल्प" पेश करती है—क्या हम रणनीतिक लाभ के लिए दुनिया के सबसे प्राचीन और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक को जोखिम में डाल सकते हैं? भविष्य का रास्ता इसी में है कि निर्माण के दौरान पर्यावरण विशेषज्ञों की सलाह को प्राथमिकता दी जाए और विकास ऐसा हो जो प्रकृति और जनजातीय अधिकारों का सम्मान करे।
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