एनएफएचएस-6 रिपोर्ट : राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण प्रगति, चुनौतियाँ और आगे की राह
संदर्भ एवं पृष्ठभूमि
भारत में जनसंख्या के स्वास्थ्य, पोषण, परिवार नियोजन और बाल विकास की स्थिति को समझने के लिए समय-समय पर व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण आयोजित किए जाते हैं। इन्हीं सर्वेक्षणों में से एक — राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) — देश की सामाजिक-स्वास्थ्य नीतियों के निर्माण और मूल्यांकन का आधार स्तंभ है। यह सर्वेक्षण केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के निर्देशन में अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (IIPS), मुम्बई द्वारा संचालित किया जाता है। बाल कुपोषण, मातृ स्वास्थ्य, संस्थागत प्रसव, टीकाकरण, प्रजनन दर तथा लैंगिक संकेतकों पर राज्यवार और राष्ट्रीय स्तर पर विस्तृत आँकड़े एकत्र कर यह सर्वेक्षण नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं और जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए एक अमूल्य दस्तावेज बनाता है। NFHS-6 की रिपोर्ट हाल ही में जारी हुई है जो पिछले सर्वेक्षण NFHS-5 (2019-21) से तुलनात्मक प्रगति का आकलन प्रस्तुत करती है।
एनएफएचएस-6 क्या है?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा आयोजित किया गया छठा व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण है। यह सर्वेक्षण वर्ष 2024-25 में संपन्न हुआ और इसे अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (IIPS), मुम्बई द्वारा क्रियान्वित किया गया। NFHS-6 के अंतर्गत देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को शामिल किया गया है। इस सर्वेक्षण के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
- प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य कार्यक्रमों की प्रगति का मूल्यांकन करना
- बाल पोषण, स्टंटिंग, वेस्टिंग और अल्पपोषण के स्तर को मापना
- संस्थागत प्रसव, मातृ स्वास्थ्य देखभाल और टीकाकरण कवरेज का आकलन करना
- लैंगिक असमानता, महिला सशक्तीकरण और घरेलू संसाधनों की स्थिति जानना
- जल, स्वच्छता, आवास और सामाजिक-आर्थिक संकेतकों का विश्लेषण करना
- नीति-निर्माण के लिए राज्यवार और जिलावार तुलनात्मक आँकड़े प्रदान करना
NFHS डीएचएस (Demographic and Health Surveys) कार्यक्रम का हिस्सा है जो वैश्विक स्तर पर 90 से अधिक देशों में संचालित होता है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय तुलना भी संभव होती है।
चर्चा में क्यों?
NFHS-6 की हालिया रिपोर्ट निम्नलिखित कारणों से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति चर्चाओं में केंद्रित है:
- स्टंटिंग में महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज हुई — 35.5% से घटकर 29.3% — जो बाल पोषण सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
- संस्थागत प्रसव 90% के ऐतिहासिक स्तर पर पहुँचा, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की पहुँच में उल्लेखनीय विस्तार को दर्शाता है।
- बच्चों का टीकाकरण कवरेज 87% (12-23 माह) तक पहुँचा, जो ASHA, AWW और ANM जैसे फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत का प्रमाण है।
- वेस्टिंग दर में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं — जो यह बताता है कि बाल पोषण के समग्र लक्ष्य अभी भी दूर हैं।
- 6-23 माह के केवल 15% बच्चों को पर्याप्त आहार मिलना — यह आँकड़ा पोषण नीति की गंभीर सीमाओं को उजागर करता है।
- मातृ समय की गरीबी (Maternal Time Poverty) को पोषण के एक उभरते निर्धारक के रूप में पहली बार इतनी गंभीरता से रेखांकित किया गया है।
- प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की ओर परिवारों के व्यय के बदलते ढाँचे ने पोषण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ाई है।
- POSHAN अभियान और अन्य सरकारी कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन इस रिपोर्ट के आधार पर किया जा रहा है।
- 0-2 आयु वर्ग के लिए अलग डेटा का अभाव नीति-निर्माण में एक महत्वपूर्ण रिक्तता के रूप में उभरा है।
रिपोर्ट के प्रमुख आँकड़े
NFHS-6 की रिपोर्ट में निम्नलिखित महत्वपूर्ण तथ्य और आँकड़े सामने आए हैं:
| संकेतक (Indicator) |
NFHS-5 (2019-21)(2019-21) |
NFHS-6 (2024-25)(2024-25) |
| स्टंटिंग (Stunting) - 5 वर्ष से कम आयु |
35.5% |
29.3% |
| वेस्टिंग (Wasting) - 5 वर्ष से कम आयु |
19.3% |
लगभग समान (गंभीर रूप में सुधार) |
| संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) |
88.6% |
90% |
| सार्वजनिक सुविधाओं में प्रसव |
~52% |
58% |
| कुशल चिकित्सा कर्मियों द्वारा प्रसव |
~88% |
91% |
| प्रसव पूर्व स्वास्थ्य जांच (कम से कम एक बार) |
~91% |
95% |
| पूर्ण टीकाकरण (12-23 माह) |
~76% |
87% |
| जन्म के 1 घंटे में स्तनपान |
~42% |
50% |
| 6-8 माह के बच्चों को ठोस/अर्ध-ठोस आहार |
~46% |
~60% |
| 6-23 माह के बच्चों को पर्याप्त आहार |
~11% |
15% |
| महिलाओं की सवैतनिक कार्य में भागीदारी |
~25% |
~30% |
स्वास्थ्य सेवाएँ एवं टीकाकरण
उपभोक्ता व्यय और खाद्य ढाँचे में बदलाव
महिला एवं श्रम संबंधी आँकड़े
भारत की वर्तमान स्थिति
NFHS-6 भारत के लिए एक मिश्रित प्रगति कार्ड प्रस्तुत करता है। एक ओर जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच में महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है, वहीं दूसरी ओर पोषण की गुणवत्ता और खाद्य अभ्यास अभी भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं में प्रगति
संस्थागत प्रसव, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा प्रसव और प्रसव पूर्व देखभाल में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के विस्तार और ASHA, AWW तथा ANM जैसे फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं की अथक सेवा का परिणाम है। टीकाकरण में 87% कवरेज इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण भारत तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सुनिश्चित की जा रही है।
पोषण में आंशिक सुधार
स्टंटिंग में 35.5% से 29.3% की गिरावट सकारात्मक है, परंतु अपर्याप्त है। भारत में अभी भी 5 वर्ष से कम आयु के लगभग 3 में से 1 बच्चा स्टंटिंग का शिकार है, जो दीर्घकालिक कुपोषण की गंभीरता को दर्शाता है। वेस्टिंग की स्थिति लगभग अपरिवर्तित बनी हुई है।
मातृ समय की गरीबी — एक उभरता संकट
भारत में महिलाएँ घर के भीतर और बाहर दोनों जगह काम करती हैं। सवैतनिक रोजगार के अलावा अवैतनिक कृषि कार्य, पशुपालन, मछलीपालन और घरेलू श्रम उनके समय और ऊर्जा का बड़ा हिस्सा लेते हैं। इस दोहरे बोझ के कारण माताएँ अपने शिशुओं को उचित समय पर, उचित तरीके से भोजन नहीं दे पातीं। ग्रामीण क्षेत्रों में क्रेच (शिशु गृह) की अनुपलब्धता के कारण माताएँ अपने शिशुओं को परिवार के बड़े सदस्यों या बड़े भाई-बहनों (प्रायः लड़कियों) के पास छोड़कर खेत पर जाती हैं, जिससे स्तनपान और पूरक आहार दोनों प्रभावित होते हैं।
प्रसंस्कृत खाद्य का जाल
आधुनिक बाजार व्यवस्था में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की सुलभता और सस्तेपन ने ग्रामीण और शहरी दोनों परिवारों के खाद्य व्यवहार को बदल दिया है। दालें, बाजरा, फल, सब्जियाँ, अंडे, दूध और मेवे जैसे पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थ महंगे और कम सुलभ हैं, जबकि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड स्नैक्स और मीठे पेय पदार्थ सहज उपलब्ध हैं। यह 'पोषण विविधता का भ्रम' — अर्थात् खाद्य विविधता बढ़ने के बावजूद पोषण की कमी — एक नई चुनौती बन रहा है।
क्षेत्रीय असमानताएँ
राष्ट्रीय औसत क्षेत्रीय असमानताओं को छिपाते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में पोषण संकेतक अभी भी राष्ट्रीय औसत से पीछे हैं, जबकि केरल, तमिलनाडु, गोवा जैसे राज्यों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। सबसे कमज़ोर वर्गों — आदिवासी समुदाय, अनुसूचित जाति, प्रवासी मज़दूर परिवार — में पोषण संकट की गहराई सबसे अधिक है।
सुधार के साथ चिंताएँ
NFHS-6 की रिपोर्ट एक साथ दो तस्वीरें प्रस्तुत करती है — प्रगति की और चुनौतियों की। निम्न तालिका मुख्य चिंता क्षेत्रों को रेखांकित करती है:
| चिंता का क्षेत्र(Indicator) |
वर्तमान स्थिति(2019-21) |
| जन्म के पहले घंटे में स्तनपान न मिलना |
50% बच्चे ही पहले घंटे में स्तनपान पाते हैं — 50% वंचित |
| पर्याप्त पूरक आहार का अभाव (6-23 माह) |
केवल 15% बच्चों को पोषण-पर्याप्त आहार उपलब्ध |
| ठोस आहार की देर से शुरुआत |
6-8 माह के ~60% बच्चों को ही ठोस/अर्ध-ठोस आहार मिलता है |
| वेस्टिंग दर में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं |
गंभीर वेस्टिंग में आंशिक सुधार, समग्र स्थिति अपरिवर्तित |
| प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का बढ़ता उपभोग |
परिवार अनाज से हटकर प्रसंस्कृत/पैकेज्ड खाद्य पर अधिक व्यय कर रहे हैं |
| 0-2 आयु वर्ग का अलग डेटा अनुपलब्ध |
स्टंटिंग का चरम दूसरे वर्ष में — लेकिन अलग डेटा नहीं |
| मातृ समय की गरीबी |
~30% महिलाएं सवैतनिक कार्य + अवैतनिक घरेलू कार्य = दोहरा बोझ |
| क्रेच (शिशु गृह) सुविधाओं का अभाव |
ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु देखभाल केंद्रों की भारी कमी |
स्वास्थ्य-पोषण की खाई
स्वास्थ्य सेवाओं (प्रसव, टीकाकरण) में सुधार का लाभ बाल पोषण सुधार में पूरी तरह नहीं दिख रहा। यह इस बात का संकेत है कि स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच और पोषण की गुणवत्ता दो अलग-अलग आयाम हैं और दोनों को एक साथ संबोधित करना होगा।
'पहले 1000 दिन' पर ध्यान की कमी
गर्भावस्था से बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक के पहले 1,000 दिन — जो शारीरिक और मानसिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण खिड़की है — पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अधिकांश मस्तिष्क विकास पहले पाँच वर्षों में होता है और स्टंटिंग का चरम दूसरे वर्ष में आता है, परंतु 0-2 आयु वर्ग का अलग डेटा अभी भी उपलब्ध नहीं है।
पोषण अभियान की सीमाएँ
प्रधानमंत्री की समग्र पोषण योजना (POSHAN अभियान) वर्तमान में गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान और उपचार पर केंद्रित है। परंतु विकास अवरोध (Growth Faltering) की रोकथाम को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली है। जल्दी पहचान और समय पर परामर्श — जो रोकथाम के लिए अनिवार्य हैं — की व्यवस्था अभी भी कमज़ोर है।
परिवर्तन का विश्लेषण: NFHS-5 से NFHS-6 तक
क्या नहीं बदला / क्या चिंताजनक बना रहा?
विशेषज्ञ विश्लेषण
NFHS-6 की रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि भारत में बाल पोषण सुधार की गति असमान है — जहाँ स्वास्थ्य सेवा डिलीवरी (टीकाकरण, संस्थागत प्रसव) में तेज़ प्रगति दिखती है, वहीं आहार की गुणवत्ता और खाद्य अभ्यास में बदलाव अत्यंत धीमा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह 'हेल्थ-न्यूट्रिशन गैप' नीतिगत प्राथमिकताओं की असंतुलित संरचना का परिणाम है। ICMR-NIN और अग्रणी पोषण शोधकर्ताओं का मत है कि मातृ समय की गरीबी और प्रसंस्कृत खाद्य की सुलभता का संयुक्त प्रभाव अगले दशक में पोषण संक्रमण को और जटिल बना देगा। यदि 'पहले 1,000 दिनों' में निवेश नहीं बढ़ाया गया तो स्टंटिंग में और कमी लाना दुष्कर होगा। नीति-निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चेतावनी यह है कि बिना बहुक्षेत्रीय अभिसरण के — अर्थात् स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, जल-स्वच्छता और सामाजिक सुरक्षा का एकीकृत ढाँचा बनाए बिना — SDG 2030 के पोषण लक्ष्य प्राप्त नहीं होंगे। क्रेच जैसे सामाजिक बुनियादी ढाँचे में निवेश महिला सशक्तीकरण और बाल पोषण, दोनों के लिए एक 'दो-इन-वन' समाधान है।
आगे की राह
NFHS-6 के आँकड़ों और विशेषज्ञ अनुशंसाओं के आधार पर निम्नलिखित बहुआयामी रणनीति अपनाई जानी चाहिए:
फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना
'पहले 1,000 दिन' पर केंद्रित नीति
सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील व्यवहार परिवर्तन
लैंगिक एवं सामाजिक ढाँचे में सुधार
निष्कर्ष
NFHS-6 भारत के लिए एक ऐसा दर्पण है जो एक साथ सफलता और संघर्ष दोनों दिखाता है। स्टंटिंग में गिरावट, टीकाकरण कवरेज में वृद्धि और संस्थागत प्रसव का 90% तक पहुँचना — ये उपलब्धियाँ फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और सरकारी कार्यक्रमों की मेहनत का प्रमाण हैं। परंतु यह प्रगति अधूरी और असमान है। जब तक 6-23 माह के 85% बच्चे पोषण-पर्याप्त आहार से वंचित हैं, जब तक वेस्टिंग की दर में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं होता, जब तक माताएँ समय की गरीबी के बोझ तले दबी रहती हैं और जब तक क्रेच, पोषण विशेषज्ञ और स्थानीय डेटा विश्लेषण की व्यवस्था नहीं बनती — तब तक बाल कुपोषण के विरुद्ध यह लड़ाई अपने लक्ष्य से दूर ही रहेगी। भारत के पास नीतिगत इच्छाशक्ति, सामुदायिक ढाँचा और पारंपरिक सांस्कृतिक संसाधन हैं — आवश्यकता है उन्हें एकीकृत, समन्वित और डेटा-आधारित रणनीति के साथ क्रियान्वित करने की। क्षेत्रों और समुदायों में समन्वित कार्रवाई के साथ, बाल पोषण में सार्थक और निरंतर प्रगति पूरी तरह से प्राप्त करने योग्य है।
NFHS-6 केवल एक रिपोर्ट नहीं है — यह भारत के हर बच्चे के भविष्य और हर माँ की मेहनत का लेखा-जोखा है। इसे केवल आँकड़ों की किताब न मानकर नीतिगत परिवर्तन की प्रेरणा और जवाबदेही का उपकरण माना जाना चाहिए।
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