संदर्भ
भारतीय न्यायपालिका में वर्तमान में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया और प्रतिनिधित्व के अभाव पर गहन बहस जारी है। हाशिए पर खड़े समुदायों की नगण्य उपस्थिति लोकतांत्रिक न्याय प्रणाली की समावेशिता पर सवाल उठाती है।
न्यायपालिका में विविधता से आशय
न्यायपालिका में विविधता का अर्थ केवल अलग-अलग क्षेत्रों से न्यायाधीशों का होना नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक, लैंगिक और धार्मिक समावेशिता शामिल है। इसका तात्पर्य है कि उच्च न्यायपालिका (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय) के बेंच पर बैठने वाले न्यायाधीश भारत की मिश्रित संस्कृति और सामाजिक संरचना का प्रतिबिंब हों। जब न्यायपीठ में विभिन्न पृष्ठभूमि (SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक और महिलाएँ) के लोग होते हैं, तो न्यायिक निर्णयों में ‘अनुभवजन्य विविधता’ आती है, जो अधिक संतुलित और मानवीय न्याय सुनिश्चित करती है।
चर्चा में क्यों?
• यह विषय वर्तमान में इसलिए चर्चा में है क्योंकि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने राज्यसभा में एक ‘निजी सदस्य विधेयक’ पेश किया है।
• इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य संविधान में संशोधन करना है ताकि न्यायिक नियुक्तियों में विविधता को अनिवार्य बनाया जा सके और उच्चतम न्यायालय की पहुंच को दिल्ली से बाहर देश के अन्य हिस्सों तक विस्तारित किया जा सके।
• आमतौर पर निजी सदस्य विधेयक कानून नहीं बनते, लेकिन वे सरकार और जनता का ध्यान महत्वपूर्ण नीतिगत सुधारों की ओर खींचने में सफल रहते हैं।
संवैधानिक प्रावधान
• अनुच्छेद 124: यह उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में है, जहाँ राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश (CJI) के परामर्श से नियुक्तियाँ करते हैं।
• अनुच्छेद 217: यह उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को परिभाषित करता है।
• अनुच्छेद 130: यह प्रावधान करता है कि उच्चतम न्यायालय दिल्ली में स्थित होगा, लेकिन CJI राष्ट्रपति की अनुमति से अन्य स्थानों पर इसकी पीठ स्थापित कर सकते हैं।
• कॉलेजियम प्रणाली: हालाँकि संविधान में इसका सीधा उल्लेख नहीं है, लेकिन 1993 के ‘द्वितीय न्यायाधीश मामले’ के बाद से यह प्रणाली लागू है, जहाँ वरिष्ठ न्यायाधीशों का समूह ही नियुक्तियों का निर्णय लेता है।
पी. विल्सन के विधेयक के मुख्य प्रस्ताव
सांसद पी. विल्सन द्वारा प्रस्तुत विधेयक में निम्नलिखित क्रांतिकारी बदलावों का प्रस्ताव है:
- आरक्षण और प्रतिनिधित्व: SC, ST, OBC, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में न्यायाधीशों के पदों पर उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
- समय सीमा: कॉलेजियम द्वारा भेजी गई सिफारिशों पर केंद्र सरकार को 90 दिनों के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य होगा।
क्षेत्रीय पीठों की स्थापना: दिल्ली के अलावा मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में उच्चतम न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों का गठन, ताकि दक्षिण, पश्चिम और पूर्वी भारत के लोगों को न्याय के लिए दिल्ली न भागना पड़े।
विविधता की कमी:
आंकड़े बताते हैं कि उच्च न्यायपालिका में विविधता की स्थिति चिंताजनक है:
- जातीय प्रतिनिधित्व: 2018 से 2024 के बीच हुई नियुक्तियों में SC, ST और OBC समुदायों का हिस्सा मात्र 20% के करीब रहा है।
- लैंगिक अंतर: उच्च न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी केवल 15% से कम है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी उच्चतम न्यायालय को अभी तक पहली महिला मुख्य न्यायाधीश नहीं मिली है (बी.वी. नागरत्ना 2027 में संभावित हैं)।
- अल्पसंख्यक: धार्मिक अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व 5% से भी कम है।
- लंबित मामले: जनवरी 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, उच्चतम न्यायालय में 90,000 से अधिक मामले लंबित हैं, जो क्षेत्रीय पीठों की आवश्यकता को पुख्ता करते हैं।
चुनौतियाँ और समाधान
चुनौतियाँ:
- योग्यता बनाम प्रतिनिधित्व: कॉलेजियम अक्सर ‘मेरिट’ (योग्यता) को प्राथमिकता देता है, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि मेरिट सामाजिक पृष्ठभूमि से अलग नहीं हो सकती।
- न्यायिक स्वतंत्रता: सरकार के हस्तक्षेप से न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होने का डर रहता है (जैसा कि 2015 में NJAC को रद्द करते समय कोर्ट ने कहा था)।
- पारदर्शिता की कमी: कॉलेजियम की प्रक्रिया बंद दरवाजों के पीछे होती है, जिससे ‘भाई-भतीजावाद’ के आरोप लगते हैं।
समाधान:
- NJAC 2.0: राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को एक नए स्वरूप में लाया जाना चाहिए जिसमें न्यायपालिका, कार्यपालिका और नागरिक समाज (Bar Council) के प्रतिनिधि शामिल हों।
- अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS): यूपीएससी की तर्ज पर निचली न्यायपालिका के लिए राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा आयोजित की जाए, जिससे मेधावी दलित, पिछड़े और आदिवासी युवा सीधे व्यवस्था में आ सकें।
- संवैधानिक निर्देश: संसद को न्यायिक नियुक्तियों में विविधता के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने चाहिए।
निष्कर्ष
न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यदि न्यायपालिका का चेहरा समावेशी नहीं होगा, तो आम जनता का इस संस्था पर विश्वास कम हो सकता है। पी. विल्सन का निजी सदस्य विधेयक एक महत्वपूर्ण चर्चा की शुरुआत है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखते हुए उसमें सामाजिक विविधता को समाहित करना समय की मांग है। क्षेत्रीय पीठों का गठन और पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया न केवल न्याय को सस्ता और सुलभ बनाएगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को और अधिक सुदृढ़ करेगी।
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